Monthly Archives : February 2010

alok verma

Darakhth


ज़न्नत और कयामत के बीच, अब बस कुछ दरख्त खड़े है वोह हमसे बड़े या हम उनसे बड़े है… हमे आशिया देने को, कितने गुलशन तबाह हुए हमारी किश्तिय खेने को, कितने घर कुरबा हुए “होली”, “लोहड़ी” के नाम पे, कितने सपनो को राख किया खेती के लालच में, पुरे जंगल को खाक किया आज माज़रा यह है की, सांसो…

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